Ranchi-15 दिसम्बर से झारखंड में शीतकालीन सत्र की शुरुआत होने वाली है. करीबन चार वर्षों के बाद विधान सभा के अंदर नेता प्रतिपक्ष की आवाज गुंजने को मिलेगी. नेता प्रतिपक्ष के रुप में अमर कुमार बाउरी के कंधों पर सत्ता पक्ष को कटघरे में खड़ा करने की चुनौती होगी. हालांकि, इसके पहले भाजपा की ओर से नेता प्रतिपक्ष के रुप में बाबूलाल की ताजपोशी की गयी थी, लेकिन दल -बदल मामले में उनका नाम फंस गया था, और लम्बी लड़ाई के बाद भी बाबूलाल को नेता प्रतिपक्ष की मान्यता नहीं मिली.

 1932 के मामले में संशोधन के साथ नया बिल ला सकती है हेमंत सरकार

लेकिन इसके साथ ही इस बार के शीतकालीन सत्र में 1932 का खतियान भी एक बड़ा मुद्दा बनता नजर आ रहा है. सत्ता पक्ष नये संशोधन के साथ खतियान आधारित स्थानीयता बिल को सदन में लाने की तैयारी में है. यहां ध्यान रहे कि 1932 का खतियान पर आधारित स्थानीयता और नियोजन नीति लेकर झारखंड में लम्बे वक्त से सियासत होती रही है. झामुमो सहित कई दूसरे सियासी और सामाजिक संगठनों के द्वारा इसी आधार पर झारखंड का स्थानीय और नियोजन नीति बनाने की मांग की जाती रही है, और इसी दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए हेमंत सरकार ने इस बिल को विधान सभा से पास किया था, लेकिन राजभवन के द्वारा इस बिल को पुनविर्चार की सलाह देते हुए वापस कर दिया गया. इस प्रकार हेमंत सरकार यह बिल विधान सभा कार्यालय पहुंच गया है, अब दावा है कि हेमंत सरकार इस बिल को किंचित संशोधनों के साथ एक बार फिर से विधान सभा से पारित करने की तैयारी में है और इसके  लिए जल्द ही कैबिनेट से इस बिल पर स्वीकृति ली जा सकती है.

राजभवन ने दिये हैं बदलाव के सलाह

यहां बता दें कि राज्यपाल ने अटॉर्नी जनरल की सलाह पर चतुर्थवर्गीय नियुक्तियों में स्थानीयता को आधार बनाने का सुझाव दिया है, जबकि तृतीय श्रेणी की नौकरियों को इससे मुक्त करने की बात की है. अब देखना होगा कि सरकार राजभवन की इस सलाह को किस रुप  में लेती है, वह अपने पुराने स्टैंड पर कायम रहती है या चतुर्थवर्गीय नियुक्तियों में ही 1932 के खतियान की अनिवार्यता रखती है.

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