टीएनपी डेस्क(TNP DESK): सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को त्रिपुरा उच्च न्यायालय के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें केंद्र से रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी और उनके परिवार को मुंबई में सुरक्षा कवर प्रदान किए जाने के आधार पर खतरे की धारणा का विवरण मांगा गया था.

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न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की पीठ ने अंबानी परिवार की सुरक्षा संबंधी जानकारी मांगने वाले उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली केंद्र की याचिका पर भी नोटिस जारी किया है. पीठ ने अपने आदेश में कहा है कि जारी नोटिस 22 जुलाई, 2022 को वापस किया जा सकता है. इस बीच, त्रिपुरा उच्च न्यायालय द्वारा पारित 31 मई, 2022 और 21 जून, 2022 के आदेशों के कार्यान्वयन पर रोक रहेगी.

सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता हुए कोर्ट में पेश

भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र की ओर से पेश होते हुए पीठ को बताया कि उच्च न्यायालय ने खतरे की धारणा का विवरण मांगा था जिसके आधार पर मुंबई में अंबानी को सुरक्षा कवर प्रदान किया गया था. सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि मुंबई में परिवार को प्रदान की गई सुरक्षा का त्रिपुरा सरकार से कोई लेना-देना नहीं है और उच्च न्यायालय के पास जनहित याचिका पर विचार करने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है. इससे पहले सोमवार को उन्होंने मामले की तत्काल सुनवाई का जिक्र करते हुए कहा कि उच्च न्यायालय ने केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधिकारियों को 28 जून को अपने समक्ष पेश होने के लिए कहा है. केंद्र सरकार ने उच्च न्यायालय के उस आदेश के खिलाफ अपील दायर की थी, जिसमें सरकार को गृह मंत्रालय (एमएचए) द्वारा रखी गई मूल फाइल को अंबानी परिवार के खतरे की धारणा और उसके द्वारा तैयार की गई मूल्यांकन रिपोर्ट के बारे में रखने के लिए कहा गया था.

हाई कोर्ट के पास इस मामले पर कोई क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र नहीं

शीर्ष अदालत में अपील में कहा गया है कि यह जनहित याचिका एक ऐसे व्यक्ति द्वारा दायर की गई है, जिसका इस मामले में कोई अधिकार नहीं था और वह सिर्फ एक मध्यस्थ है, जो खुद को एक सामाजिक कार्यकर्ता और पेशे से छात्र होने का दावा करता है. सरकार ने अपनी याचिका में कहा कि याचिका एक गलत, तुच्छ और प्रेरित जनहित याचिका है, जहां किसी भी मौलिक अधिकार का उल्लंघन भी नहीं किया गया था. सरकार की ओर से आगे कहा गया कि उच्च न्यायालय इस बात की सराहना करने में विफल रहा है कि अंबानी परिवार के सदस्य न तो त्रिपुरा के निवासी थे और न ही त्रिपुरा से दूर उत्पन्न होने वाली किसी भी कार्रवाई का हिस्सा हैं. इसलिए, उच्च न्यायालय के पास इस मामले पर कोई क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र नहीं है और न ही विषय वस्तु क्षेत्राधिकार है.