रांची(RANCHI): झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार ने 5 सितंबर को विधानसभा का एकदिवसीय विशेष सत्र बुलाया था. इस सत्र में सरकार की ओर से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने विश्वास प्रस्ताव पेश किया और 48 विधायकों के समर्थन से सरकार ने विश्वास मत जीत लिया. बता दें कि पूरे दिन मीडिया इसे बिग बेक्रिंग हेडलाइंस के साथ चलाती रही, लेकिन इस बीच एक बड़ा सवाल मीडिया से छूट गया वो ये कि आखिर सरकार ने ये विश्वास प्रस्ताव क्यों लाया. क्योंकि आम तौर पर विश्वास या अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष की मांग पर लाया जाता है या राज्यपाल के निर्देश पर. या किसी विशेष परिस्थिति में कोर्ट के आदेश पर सरकार विश्वास प्रस्ताव पेश करती है. लेकिन, अभी ना तो विपक्ष ने इस प्रस्ताव की मांग की थी. ना ही राज्यपाल ने कोई निर्देश दिया था और ना ही कोर्ट की ओर से ऐसा कोई आदेश दिया गया था. तो सरकार को इसकी जरुरत क्यों पड़ी? चलिए जानते हैं इस स्टोरी में.

राजभवन पर बढ़ेगा दबाव

जानकारों का मानना है कि एक दिवसीय विशेष सत्र में विश्वास मत प्रस्ताव लाकर सरकार अपनी एकजुटता दिखाना चाहती थी. इस प्रस्ताव के साथ ही सरकार राजभवन में दबाव बढ़ाना चाहती थी. ताकि राज्यपाल हेमंत सोरेन से जुड़े मामले का पत्र जल्द सार्जवजनिक करने को मजबूर हो जाएं. सरकार ने दिखा दिया कि बहुमत अभी भी उसके साथ है. भारत निर्वाचन आयोग का फैसला अगर हेमंत सोरेन के खिलाफ भी आता है तब भी बहुमत पर्याप्त है.

विपक्ष के टूट के वादे को किया गलत साबित

विश्वास प्रस्ताव लाकर सरकार ने दिखा दिया कि पूरी यूपीए एकजुट है. सरकार में टूट की बात महज विपक्ष और मीडिया की अफवाह है. सरकार के इस कदम में विपक्ष पूरी तरह बैकफूट में नजर आ रहा है. विपक्ष के हौसले थोड़े कम हुए हैं और सरकार ने अपनी एकता का परिचय दिया है. इसके साथ ही सरकार ने जनता के बीच एक संदेश दिया है कि आपकी चुनी हुई सरकार पूरी तरह सुरक्षित है और हम सभी विधायक साथ हैं.

हेमंत को कांग्रेस विधायकों का डर       

सरकार के इस विश्वास प्रस्ताव के पीछे सबसे बड़ा कारण कांग्रेस विधायकों को माना जा रहा है. चलिए पहले उन घटनाक्रम को समझते हैं, जिनके चलते ऐसी स्थित उत्पन्न हुई. 29 जुलाई को कांग्रेस के तीन विधायक इरफान अंसारी, नमन विक्सल कोंगाड़ी और राजेश कच्छप 48 लाख रुपये के साथ पकड़े गए. कोलकाता पुलिस ने उन तीनों को गिरफ्तार किया था. इसके बात खबरें चली  कि तीनों विधायकों को ये पैसे हेमंत सोरेन की सरकार गिराने के बदले में मिले थे. इसके खिलाफ कांग्रेस के ही विधायक अनूप सिंह उर्फ जयमंगल सिंह ने मामला भी दर्ज कराया. ये भी बताया जा रहा था कि इन विधायकों के संपर्क में कांग्रेस के और भी विधायक थे. मामला दर्ज कराने वाले विधायक अनूप सिंह ने भी सरकार गिराने के बदले मंत्री पद और 10 करोड़ रुपए मिलने की बात कही थी. इसके पहले राष्ट्रपति चुनाव में भी कांग्रेस विधायकों ने पार्टी के विरुद्ध जाकर क्रॉस वोटिंग की थी.

सरयू राय ने खड़े किए सवाल

जमशेदपुर पूर्वी के विधायक सरयू राय ने भी इस बात को माना. उन्होंने कहा कि कांग्रेस के विधायकों को बस में बंद करके पहले रायपुर भेजा गया. फिर बस में बंद करके ही हाउस में लाया गया. और जबरदस्ती बेमन से उन विधायकों से समर्थन ले लिया गया. सरयू राय ने कहा कि कांग्रेस का जो समर्थन है वो बेमन का समर्थन और मजबूरी में दिया गया समर्थन है. सरयू राय ने कहा कि राज्य में मुख्यमंत्री के लिए ये अनुकूल संदेश नहीं गया. सरयू राय ने कहा कि ये सरकार की एक निरर्थक कवायद थी. इससे राज्य में किसी को लाभ होने के बजाए सिर्फ नुकसान ही हुआ है. उन्होंने कहा कि सदन बुलाना बेमतलब था और जिस तरह सदन बुलाकर सरकार ने अपने खिलाफ ही विश्वास प्रस्ताव पेश किया वो संदेह खड़ा करता है.

राज्यपाल के पास है भारत निर्वाचन आयोग का फैसला

ये सब मामला चल ही रहा था कि चुनाव आयोग ने खनन लीज मामले में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के खिलाफ सुनवाई पूरी हुई और इस मामले में चुनाव आयोग ने फैसला सुरक्षित रख लिया है. फिर अचानक खबर चलनी शुरू हुई  कि चुनाव आयोग ने अपना फैसला राज्यपाल को सौंप दिया है और राज्यपाल कभी भी फैसला सुना सकते हैं. राज्यपाल के फैसले के बारे में खबरें चलीं कि फैसला मुख्यमंत्री के खिलाफ आ सकता है. और अगर फैसला सीएम हेमंत के खिलाफ आता है तो उन्हें इस्तीफा देना पड़ सकता है. खबरें जोर पकड़ने लगी. सीएम हाउस तक भी खबरें पहुंची. इसके बाद सीएम हाउस में विधायकों के बैठकों का दौर चालू हुआ. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को सबसे बड़ी चिंता थी कि अगर उनकी सदस्यता जाती है तो कहीं विधायकों में कोई फूट ना पड़ जाए. साथ ही बीजेपी द्वारा विधायकों की खरीद फरोख्त का भी उन्हें डर था. क्योंकि समय-समय पर इस बारे में यूपीए की ओर से इस बारे में कहा जाता रहा है. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को सबसे ज्यादा चिंता झामुमो के विधायकों से नहीं बल्कि कांग्रेस विधायकों से थी. ऐसा राज्य में पिछले घटनाक्रम को देखते हुए माना भी जा सकता है.